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4 जुलाई, रात 07:05
आज फिर वही पुरानी डायरी खोली…
कुछ शब्द थे जो कभी कहे नहीं गए, कुछ एहसास जो कभी भेजे नहीं गए…
कभी-कभी सोचती हूँ —
क्या सच में उन चिट्ठियों को भेजना ज़रूरी था?
या उन्हें सिर्फ़ लिख देना ही काफ़ी था?
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💭 जब दिल भारी हो, और कहने वाला कोई न हो, तब लिखना सुकून देता है।
मैंने कई बार ऐसे लोगों को खत लिखे जो अब मेरी ज़िंदगी में नहीं हैं।
कभी माफ़ी माँगी, कभी खुद को माफ़ किया।
कभी मन की बात कह दी, बिना डर के।
इन ख़तों में दर्द था, लेकिन सुकून भी।
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✍️ ये ख़त भेजे क्यों नहीं?
क्योंकि कुछ बातें सिर्फ़ दिल और डायरी के बीच रह जानी चाहिए।
उनमें closure है — जवाब नहीं।
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🌿 क्या हुआ इन चिट्ठियों को लिखने के बाद?
मन हल्का हो गया
नींद गहरी आई
दिल में कम उथल-पुथल रही
और सबसे ज़्यादा — खुद से फिर से जुड़ने लगी
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📌 अगर आप भी कुछ कह नहीं पा रहे, तो बस एक पेन उठाइए और लिख डालिए।
कोई फॉर्मेट नहीं, कोई डर नहीं, कोई grammar नहीं चाहिए।
बस दिल की बात, वैसे जैसे वो अंदर बैठी है।
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मैंने सीखा —
“हर ख़त जिसे तुम कभी नहीं भेजते, वो दरअसल खुद को ही भेजा गया होता है।”
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लिखिए… और देखिए, शब्दों में कितना जादू होता है।
आप healing करेंगे, बिना किसी डॉक्टर के।
आप closure पाएंगे, बिना किसी जवाब के।
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ये सिर्फ़ शब्द नहीं हैं — ये मेरे आँसू, मेरी मुस्कान, मेरी चुप्पी हैं…
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💌 आपके लिए एक छोटा सा काम
आज रात, अपने किसी पुराने रिश्ते के नाम एक ख़त लिखिए…
भेजिए मत, बस लिखिए।
फिर मुझे बताइए कि कैसा महसूस किया।



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